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Brief of Wellington Cantonment..

Wellington Cantonment is situated three kilometers to the north of Coonoor. The Mettupalayam-Ooty road passes through the Cantonment. The Wellington Cantonment was earlier known as Jakkatalla (or Jacketallah) from the Badaga Village of that name to the north of it. In 1852, Sir Richard Armstrong, the then Commander-in-Chief, recommended that the name should be changed to Wellington in honor of the Iron Duke, who from the first had evinced an... Read more

वेलिंगटन छावनी का संक्षिप्ति परिचय

वेलिंगटन छावनी कुन्नूर के उत्तर में तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । मेटुपालयम ऊटी रोड छावनी से गुजरती है । वेलिंगटन छावनी पहले जगतला गॉंव के नाम से जाना जाता था जो छावनी परिषद के उत्तर में एक बड़गा गॉंव है । वर्ष 1852 में , सर रिचार्ड आमस्ट्रांग ने, जो उस समय मुख्य कमानडर थे, सिफारिश की थी कि इस स्थान का नाम आयरन ड्यूक के सम्मान में वेलिंगटन रखा जाना चाहिए, जिन्होंनें नीलगिरी में सर्वप्रथम सेन्टोरियम स्थापित कराने में रूचि दिखाई थी । वर्ष 1860 में सर चार्लस ट्रेवेलियन ने अपना विचार व्यक्तथ करते हुए कहा था कि इस रोचक सैनिक स्थापना का नाम वेलिंगटन रखना सबसे उपयुक्त होगा इस लिए उन्होंने आदेश दिया कि जगतला का नाम वेलिंगटन रखा जाए ।

• बैरक्स का निर्माण कार्य वर्ष 1852 में शुरू हुआ और 1860 में पूरा हुआ जिसे आज हम वेलिंगटन बैरक्स् कहते है । कालांतर यह स्थान महत्वपूर्ण होने लगा और 1947 से मद्रास रेजिमेंटल सेंटर की स्थापना हो गई । वेलिंगटन बैरक्स को अब मद्रास रेजिमेंट के प्रथम भारतीय कर्नल जनरल एस.एम.श्रीनागेश की याद में श्री नागेश बैरक्स कहा जाता है ।

देशी बाजार जो बैरक्स के कुछ ही दूरी पर वाटरलू ब्रिज पार करने के बाद दूसरी ओर नाले के किनारे स्थित था उसे अब कंटोन्मेंट बाजार कहा जाता है । वाटरलू ब्रिज का प्रसिद्ध नाम ब्लाक ब्रिज है जो पहले लकडी का पुल हुआ करता था । पुल का पुनर्निर्माण मार्च 2009 में किया गया और फील्ड मार्शल सैम मनेक्शॉ की याद में इसका नाम मनेक्शॉ ब्रिज रखा गया । यहॉं स्थित सेंट जार्ज अंगलीकन चर्च और सेंट जोसफस रोमन कथोलिक चर्च, की डिज़ाइनिंग मेजर मोरैंट आर.ई. द्वारा की गई थी और इसका निर्माण क्रमश: 1885 और 1888 में किया गया ।

• मद्रास रेजिमेंटल सेंटर के वार मेमोरियल के सामने प्रसिद्ध रक्षा सेवा स्टाफ कालेज की स्थांपना 1949 में की गई ।


वेलिंगटन छावनी वर्ग II छावनी है जिसका जनसंख्या लगभग 20000 है । यह प्रसिद्ध पर्वतीय पर्यटन स्थल ऊटी से लगभग 20 किलोमीटर दूर नीलगिरी नामक सुन्दिर पहाड़ों के उपर स्थित है । यह स्थान हरे भरे पेड़ पौधों और चाय के एस्टेट से घिरा हुआ है । यहॉं का वातावरण साल भर सुहाना रहता है । बहुत से महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल जैसे मुधुमलै राष्ट्रीय उद्यान, बोटैनिकल गार्डन, दोडाबैट्टा की चोटी, कलहट्टी झरना, पैकारा झील, ऊटी झील आदि इस कन्टोंनमेंट के समीप ही स्थित हैं ।

रक्षा सेवा स्टाफ कालेज
तमिलनाडु में वेलिंगटन में स्थित रक्षा सेवा स्टाफ कालेज उन कुछ संस्थानों में से एक है जहां तीन सेवाओं, सेना, नौसेना और वायुसेना के इच्छुक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है । इसके अलावा यहाँ पैरा सेना, सिविल सेवाओं और मित्रवत विदेशी देशों के चयनित अधिकारियों के लिए भी प्रशिक्षण दिया जाता है ।

मनेक्शॉ ब्रिज
पुल का इतिहास जो ऊटी कूनूर रोड को वेलिंगटन छावनी से जोड़ता है, 1878 में पाया जा सकता है। मैनाला नदी पर पहली बार वाटरलू ब्रिज नामक एक लकड़ी की संरचना का निर्माण किया गया। यह पुल आमतौर पर ब्लैक ब्रिज नाम से जाना जाता था क्योंकि यह बर्मा टीक से बनाया गया था और इस पर काले रंग का पेंट लगाया गया था । 43.5 मीटर लंबा इस पुल का पुनर्निर्माण मार्च 2009 में किया गया और फील्ड मार्शल सैम मनेक्शॉ की याद में इसका नाम मनेक्शॉ ब्रिज रखा गया ।

नीलगिरिस माउंटेन रेलवे
मेट्टुपलयम से नीलगिरिस हिल्स तक पहाड़ी रेलवे बनाने का पहला योजना 1854 में तैयार किया गया था । लेकिन 45 साल बाद सन 1899 में ही पहली ट्रेन इस ट्रैक पर दौड़ सका । इस ट्रैक को इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है । यह ट्रेन भारत में सबसे धीमी ट्रेन है जो 10.4 किमी प्रति घंटा की औसत गति से चलती है।
19वीं शताब्दी में निर्मित, यह ट्रैक 12 में 1 के ढाल पर बढ़ता है। इसमें 208 वक्र और 13 सुरंग हैं । 1908 में अंग्रेजों द्वारा तमिलनाडु में स्थित नीलगिरिस माउंटेन रेलवे का निर्माण किया गया था। 2005 में, यूनेस्को ने दार्जिलिंग माउंटेन रेलवे के साथ विश्व विरासत स्थल में नीलगिरिस माउंटेन रेलवे को जोड़ा और तब से यह साइट भारत के पर्वत रेलवे के रूप में जाना जाने लगा। आवश्यक मानदंडों को संतुष्ट करने के बाद, इस रेलवे का आधुनिकता योजना की त्याग को मजबूर कर दिया गया जिसमें 41.8 किलोमीटर ट्रैक, 108 घटता, 16 सुरंगों और 250 पुलों शामिल है ।रेलवे बनाने का निर्णय 1854 में लिया गया था। 45 वर्षों के बाद नीलगिरिस पर्वत रेलवे का निर्माण हुआ और 1899 में जनता के लिए खोला गया । मेट्टुपलयम से ऊटी तक रेलवे ट्रैक की लंबाई 45.88 किलोमीटर है ।